Saturday, 30 January 2016

एवं C++ में समानताएं/असमानताएं
एवं C++ में समानताएं :-
प्रोग्रामिंग भाषा C++ तथा C में निम्न समानताएं हैं :-
1. प्रोग्रामिंग भाषा C++, C के समान केस सेन्सेटिव है ।
2. प्रोग्रामिंग भाषा C++ में तथा C में लिखे जाने वाले प्रोग्राम में स्टेटमेन्ट के अंत में ‘;’ सेमीकोलोन लगाया जाता है ।
3. प्रोग्रामिंग भाषा C++ में लिखे प्रोग्राम में भी C के समान परिवर्तनांकों को उनके प्रयोग के पूर्व घोषित करना आवश्यक है ।
4. लोकल एवं ग्लोबल परिवर्तनांक का मान समान हो सकता है । प्रोग्राम लोकल परिवर्तनांक के मान का प्रयोग करता है ।
तथा C++ में असमानताएं :-
1. लोकल एवं ग्लोबल परिवर्तनांकों का नाम समान हो सकता है । प्रोग्राम लोकल परिवर्तनांक के मान का प्रयोग करता है ।
2. प्रोग्रामिंग भाषा C स्ट्रक्चर्ड प्रोग्रामिंग है । जबकि C++ वस्तु केन्द्रित प्रोग्रामिंग भाषा है ।
3. C++ में आइडेन्टीफायर में कितनी भी संख्या में कैरेक्टर हो सकते हैं । जबकि C में आइडेन्टीफायर में 32 कैरेक्टर ही हो सकते हैं ।
4. C++ प्रोग्रामिंग formfree प्रोग्रामिंग है जबकि C में एक Form के अनुरूप प्रोग्रामिंग करनी होती है ।
5. प्रोग्रामिंग भाषा C++ में हम नए डेटाटाइप भी बना सकते हैं । जबकि C में ऐसा सम्भव नहीं है ।
6. प्रोग्रामिंग भाषा C में किसी परिवर्तनांक के पास में सीधे-सीधे प्रयोग एवं परिवर्तन किया जा सकता है जबकि प्रोग्रािमंग भाषा C++ में परिवर्तनांक के मान का प्रयोग परिवर्तन अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है ।
7. प्रोग्रामिंग भाषा C में हैडर फाइल Stdio.h को इन्क्लूड करवाया जाता है जबकि C++ में iostream.h हैडर करवा कर इन्क्लूड करवाया जाता है ।
8. C++ में main() फंक्शन int टाइप की मान रिटर्न करता है । जबकि C++ में यह फंक्शन किसी प्रकार का कोई मान रिटर्न नहीं करता है ।
9. प्रोग्रामिंग भाषा C++ में निर्देश में C की अपेक्षा अधिक सरल और सुगम बनाया गया है ।

वस्तु केन्द्रित प्रोग्रामिंग एक परिचय
          हम आम जीवन में किसी भी समस्या के समाधान करने के लिए पहले अपना ध्यान उस वस्तु पर केन्द्रित करते हैं तथा उस वस्तु की विशेषताओं और कमियों से ही उसके प्रयोग की विधियों की खोज करते हैं । इसे इस प्रकार समझें कि यदि हमें किसी मशीन के किसी दोष को दूर करना है, तो सर्वप्रथम उस मशीन तथा उसकी कार्य-विधि आदि के बारे में गहन विचार करते हैं, अब इस मशीन को ठीक करने के लिए उपरोक्त विचार के अनुरुप विधि एवं सामग्री का चुनाव करते हैं । इस विधि से किया गया कार्य समस्या का सटीक निदान होता है । इस प्रकार हम देखते हैं समस्त विश्व वस्तु केन्द्रित (OBJECT ORIENTED) ही है । कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग में प्रोग्रामिंग की आधुनिक शैली वस्तु केन्द्रित प्रोग्रामिंग भी इसी तथ्य के अनुरुप है । आधुनिक कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग भाषाओं; जैसे – C एवं जावा आदि में इसी प्रोग्रामिंग शैली का प्रयोग होता है ।
मुख्य गुण
· प्रक्रिया से ज्यादा आंकड़ों को महत्व दिया जाता है ।
· प्रोग्राम का ऑब्जेक्ट में विभाजन किया जाता है ।
· आंकड़ों का रूपांकन इस प्रकार किया जाता है कि वह ऑब्जेक्ट की विशेषताओं को दिखायें ।
· ऑब्जेक्ट में काम करने वाले फलनों को डेटा-स्ट्रकचर में साथ-साथ रखा जाता है ।
· आंकड़ों को गुप्त रखा जाता है तथा बाह्य फलनों को उनके परिग्रहण की अनुमति नहीं होती है ।
· ऑब्जेक्टों का आपसी सम्पर्क फलनों के द्वारा होता है ।
कम्प्यूटर प्रोग्राम लिखने की परम्परागत प्रोग्रामिंग शैली में हम परिवर्तनों (VARIABLES) का प्रयोग फंक्शन (FUNCTION) के अन्दर करते हैं । इन्हीं परिवर्तनांकों के आधार पर प्रोग्रामिंग में अनेक प्रकार के कार्य; जैसे – गणनाएं, आकड़ें प्रिंट करना, आकड़ें संचित करना आदि कार्य होते हैं । छोटे प्रोग्राम में हम इन परिवर्तनांक को सरलता से नियंत्रित कर सकते हैं, परन्तु जैसे-जैसे प्रोग्राम बड़ा होता जाता है इन परिवर्तनांकों को नियंत्रित करना कठिन होता जाता है और प्रोग्रामिंग में गलतियां होने की सम्भावनाएं बढ़ती जाती है । वस्तु केन्द्रित प्रोग्रामिंग में परिवर्तनांकों एवं प्रोग्राम्स को एक वर्ग (CLASS) में सम्बद्ध कर दिया जाता है, जिससे अन्य प्रोग्राम द्वारा किसी वर्ग के आंकड़े प्रभावित नहीं होते हैं । इससे प्रोग्राम को नियंत्रण करना सरल हो जाता है । इस कार्य को वस्तु केन्द्रित प्रोग्रामिंग भाषा में एनकैप्स्यूलेशन (ENCAPSULATION) जिसका शाब्दिक अर्थ एक के भीतर दूसरा रखने का किया है, कहा जाता है । प्रोग्रामिंग की वस्तु केन्द्रित शैली में पहने से बने किसी प्रोग्राम अथवा वर्ग के आधार पर नए प्रोग्राम को बना सकते हैं । वस्तु केन्द्रित प्रोग्रामिंग की इस विशेषता को उत्तराधिकार (INHERITANCE) कहा जाता है । प्रोग्रामिंग की इस विशेष शैली का प्रयोग करते हुए हम पहले से बने किसी प्रोग्राम अथवा वर्ग (CLASS) का प्रयोग करके एक नया और समृद्ध सॉफ्टवेयर अत्यंत अल्प समय में विकसित कर सकते हैं ।

वस्तु केन्द्रित प्रोग्रामिंग के सिद्धांत
ऑब्जेक्ट
दैनिक दिनचर्या में हम जिस ओर भी दृष्टि डालते है।, चारों ओर वस्तु ही पाते हैं । यह संसार वस्तुमय है । जिसे पहचाना जा सके, जिसका एक आकार होता है, संरचना होती है, व्यवहार होता है, वस्तु कहलाती है प्रोग्रामिंग की वस्तु केन्द्रित शैली का भी यही मुख्य आधार है । विभिन्न वस्तुओं को एकत्र करके प्रयोग का एक नमूना तैयार किया जाता है, जोकि सार्वजनिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आपस में सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं । ऑब्जेक्ट किसी वर्ग का एक दृष्टांत होता है ऑब्जेक्ट एवं पब्लिक फंक्शन की सहायता से ही वर्ग में घोषित किए गए परिवर्तनांकों के मान में परिवर्तन किया जाता है ।
वर्ग (Class) 
वर्ग वर्ग विभिन्न फंक्शन्स एवं परिवर्तनांकों का एक समूह है किसी भी ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्राम में कम-से-कम एक वर्ग का घोषित किया जाना आवश्यक होता है । वर्ग एक प्रयोगकर्ता द्वारा परिभाषित डेटा-टाइप है ।
आंकड़ों का पृथककरण एवं नियंत्रण
1.गुण पृथककरण(Abstraction)
आंकड़ों के पृथककरण का आशय सम्पूर्ण जटिलता के सरलीकरण से है । इस प्रकार समझें कि हम लाइट ऑन करने के लिए स्विच को दबाने से स्विच के अन्दर क्या हुआ, स्विच दबाने से लाइट कैसे ऑन हुई । हमें यह सब जानने की आवश्यकता नहीं होती । यही गुण पृथककरण कहलाता है ।
2.आंकड़ा नियन्त्रण(Encapsulation)
आंकड़ा नियन्त्रण वस्तु केन्द्रित प्रोग्रामिंग शैली का एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है । यहडेटा स्ट्रक्चर एवं Functionality को वस्तु (Object) में मिलाता है । एनकैप्स्यूलेशन ऑब्जेक्ट के आन्तरिक रूप को उसके उपयोगकर्ता से छुपाता भी है और उपयोग हो सकने वाले ऑब्जेक्ट को सूचित भी करता है । आंकड़ा नियन्त्रण अर्थात् फंक्शन्स व आंकड़ों का एकीकरण करना । ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग शैली की इस विशेषता के कारण हम प्रोग्राम और एवं आंकड़ों दोनों को बाहरी नियंत्रण से बचा सकते हैं ।
उत्तराधिकार(Inheritance)
उत्तराधिकार भी ऑब्जेक्ट्स ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग शैली की एक महत्वपूर्ण एवं उपयोगी विशेषता है । इसके द्वारा हम एक वर्ग की विशेषताएं किसी दूसरे वर्ग से प्राप्त करवा सकते हैं । उत्तराधिकार की धारणा का प्रयोग करके पुराने वर्ग से नए वर्ग का निर्माण सम्भव है । नए वर्ग को व्यूत्पन्नवर्ग (Derived Class) तथा पुराने वर्ग, जिससे इसे बनाया गया है, को मूल वर्ग (Base Class) कहा जाता है यह व्यूत्पन्नवर्ग (Derived Class) का मूल वर्ग की आंकड़ा डाटा संरचनाओं एवं फंक्शन्स पर समान अधिकार रखता है । यह नया वर्ग मूल वर्ग से लिए गए आंकड़ों एवं फंक्शन्स में नए आंकड़ें एवं फंक्शन्स को जोड़ सकता है ।
 यह वस्तु केन्द्रित प्रोग्रामिंग का एक अनिवार्य गुण है इसमें पृष्ठ-भूमि या किसी स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं है ।
· यह एक प्रक्रिया है जिसमें एक वस्तु किसी दूसरे वस्तु के गुणों का उपार्जन करती है ।
· यह कि यह विधि किसी सामान्य वस्तु विशिष्ट करने का गुण रखती है ।
· यह reusability का विचार प्रदान करती है ।
· हम पहले बने वर्ग में बिना किसी परिवर्तन के नये गुणों को जोड़ सकते हैं ।
बहुरूपण(Polymorphism)
बहुरूपण का शाब्दिक अर्थ है । एक नाम पर अनेक कार्य । इस विधि से हम किसी कार्य को पृथक परिस्थिति में उसी के अनुसार करवा सकते हैं । बहुरूपण हमें समान बाहरी स्ट्रक्चर के आन्तिरक भिन्नता लिए हुए ऑब्जेक्ट्स को प्रयोग करने से की सुविधा प्रदान करता है । · बहुरूपण एक से अधिक रूप लेने की क्षमता प्रदान करता है ।
· विभिन्न वस्तुओं के संदर्भ में प्रचालन एक से अधिक व्यवहार प्रदर्शित करता है ।
· फंक्शन तथा ऑपरेटर का व्यवहार प्रचालन में प्रयोग किए गए आंकड़ों पर निर्भर करता है ।
बहुरूपण दो प्रकार के होते हैं –
1. फंक्शन ओवरलोडिंग(Function Overloading)–फंक्शन एक से अधिक व्यवहार प्रदर्शित करता है ।
2. ऑपरेटर ओव्हरलोडिंग (Operator Overloading)-– ऑपरेटर विभिन्न वस्तुओं के सन्दर्भ एक से अधिक व्यवहार प्रदर्शित करता है ।
संदेश प्रवहन
ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्राम एक अनेक ऑब्जेक्ट्स का समूह होता है, जो आपस में एक-दूसरे को आवश्यकता पड़ने पर संदेश भेजते भी हैं और प्राप्त भी करते हैं । किसी ऑब्जैक्ट के लिए एक सन्देश एक निश्चित प्रक्रिया अथवा प्रक्रिया को कार्यान्वित करने के लिए होता है । अतः सन्देश प्राप्त करके ऑब्जेक्ट एक निश्चित प्रक्रिया को कार्यान्वित करके परिणाम प्रस्तुत करता है । संदेश प्रवहन एक निश्चित प्रक्रिया कार्यान्वित करने के लिए होता है अतः संदेश प्राप्त करके ऑब्जेक्ट एक निश्चित प्रक्रिया कार्यान्वित करके परिणाम प्रस्तुत करते हैं । संदेश प्रवहन के लिए हमें ऑब्जेक्ट का नाम, फंक्शन का नाम तथा उपयोगी जानकारी देनी पड़ती है ।
प्रोग्रामिंग क्या है ?
सामान्य जीवन में हम किसी कार्य विशेष को करने का निश्चय करते हैं तो उस कार्य को करने से पूर्व उसकी रूपरेखा सुनिश्चित की जाती है । कार्य से सम्बन्धित समस्त आवश्यक शर्तों का अनुपालन उचित प्रकार हो एवं कार्य में आने वाली बाधाओं पर विचार कर उनको दूर करने की प्रक्रिया भी रूप रेखा तैयार करते समय महत्वपूर्ण विचारणीय विषय होते हैं । कार्य के प्रारम्भ होने से कार्य के सम्पन्न होने तक के एक-एक चरण (step) पर पुनर्विचार करके रूपरेखा को अन्तिम रूप देकर उस कार्य विशेष को सम्पन्न किया जाता है । इसी प्रकार कम्प्यूटर द्वारा, उसकी क्षमता के अनुसार, वांछित कार्य कराये जा सकते हैं । इसके लिए आवश्यकता है कम्प्यूटर को एक निश्चित तकनीक व क्रम में निर्देश दिए जाने की, ताकि कम्प्यूटर द्वारा इन निर्देशों का अनुपालन कराकर वांछित कार्य को सम्पन्न किया जा सके । सामान्य बोल-चाल की भाषा में इसे प्रोग्रामिंग कहा जाता है ।
कम्प्यूटर को निर्देश किस प्रकार दें ?
कम्प्यूटर को निर्देश योजनाबद्ध रूप में, अत्यन्त स्पष्ट भाषा में एवं विस्तार से देना अत्यन्त आवश्यक होता है । कम्प्यूटर को कार्य विशेष करने के लिए एक प्रोग्राम बनाकर देना होता है । दिया गया प्रोग्राम जितना स्पष्ट, विस्तृत और सटीक होगा, कम्प्यूटर उतने ही सुचारू रूप से कार्य करेगा, उतनी ही कम गलतियां करेगा और उतने ही सही उत्तर देगा । यदि प्रोग्राम अस्पष्ट होगा और उसमें समुचित विवरण एवं स्पष्ट निर्देश नहीं होंगे तो यह सम्भव है कि कम्प्यूटर बिना परिणाम निकाले ही गणना करता रहे अथवा उससे प्राप्त परिणाम अस्पष्ट और निरर्थक हों ।कम्प्यूटर के लिए कोई भी प्रोग्राम बनाते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है –
1. समस्या का सावधानीपूर्वक अध्ययन करके निर्देशों को निश्चित क्रम में क्रमबद्ध करना ।
2. निर्देश इस प्रकार लिखना कि उनका अक्षरशः पालन करने पर समस्या का हल निकल सके ।
3. प्रत्येक निर्देश एक निश्चित कार्य करने के लिए हो ।
प्रोग्रामिंग के विभिन्न चरण 
किसी भी प्रोग्राम की प्रोग्रामिंग करने के लिए सर्वप्रथम प्रोग्राम के समस्त निर्देष्टीकरण को भली-भांति समझ लिया जाता है । प्रोग्राम में प्रयोग की गई सभी शर्तों का अनुपालन सही प्रकार से हो रहा है अथवा नहीं, यह भी जांच लिया जाता है । अब प्रोग्राम के सभी निर्दिष्टीकरण को जांचने-समझने के उपरान्त प्रोग्राम के शुरू से वांछित परिणाम प्राप्त होने तक के सभी निर्देशों को विधिवत क्रमबद्ध कर लिया जाता है अर्थात प्रोग्रामों की डिजाइनिंग कर ली जाती है । प्रोग्राम की डिजाइन को भली-भांति जांचकर, प्रोग्राम की कोडिंग की जाती है एवं प्रोग्राम को कम्पाइल किया जाता है । प्रोग्राम में टेस्ट डेटा इनपुट करके प्रोग्राम की जांच की जाती है कि वास्तव में सही परिणाम प्राप्त हो रहा है अथवा नहीं । यदि परिणाम सही नहीं प्राप्त होते हैं तो इसका अर्थ है कि प्रोग्राम के किसी निर्देश का क्रम गलत है अथवा निर्देश किसी स्थान पर गलत दिया गया है । यदि परिणाम सही प्राप्त होता है तो प्रोग्राम में दिए गए निर्देशों के क्रम को एकबद्ध कर लिया जाता है एवं निर्देशों के इस क्रम को कम्प्यूटर में स्थापित कर दिया जाता है । इस प्रकार प्रोग्रामिंग की सम्पूर्ण प्रक्रिया सम्पन्न होती है ।

प्रोग्रामिंग के विभिन्न चरण
1).एल्गोरिथ्म
पारिभाषिक शब्दों में किसी गणितीय समस्या अथवा डाटा को कदम-ब-कदम इस प्रकार विश्लेषित करना जिससे कि वह कम्प्यूटर के लिए ग्राह्म बन सके और कम्प्यूटर उपलब्ध डाटा को प्रयोग में लेकर गणितीय समस्या का उचित हल प्रस्तुत कर सके, एल्गोरिथ्म कहलाता है । जब कम्प्यूटर पर करने के लिए कोई कार्य दिया जाता है तो प्रोग्रामर (आप) को उसकी संपूर्ण रूपरेखा तैयार करनी होती है तथा कम्प्यूटर से बिना गलती कार्य करवाने के लिए किस क्रम से निर्देश दिए जाएंगे, यह तय करना होता है । अर्थात किसी कार्य को पूर्ण करने के लिए विभिन्न चरणों से गुजरना पड़ता है । जब समस्या के समाधान हेतु विभिन्न चरणों को क्रम से क्रमबद्ध करके िलखा जाये तो यह एल्गोरिथ्म कहलाता है ।
ध्यान रखें
· एल्गोरिथ्म में दिए गए समस्त निर्देश सही एवं स्पष्ट अर्थ के होने चाहिए ।
· प्रत्येक निर्देश ऐसा होना चाहिए कि जिसका अनुपालन एक निश्चित समय में किया जा सके ।
· कोई एक अथवा कई निर्देश ऐसे न हों जो अन्त तक दोहराए जाते रहें । यह सुनिश्चित करें कि एल्गोरिथ्म का अन्ततः समापन हो ।
· सभी निर्देशों के अनुपालन के पश्चात, एल्गोरिथ्म के समापन पर वांछित परिणाम अवश्य प्राप्त होने चाहिए ।
· िकसी भी निर्देश का क्रम बदलने अथवी किसी निर्देश के छूटने पर एल्गोरिथ्म के समापन पर वांछित नहीं प्राप्त होंगे ।
2). प्रवाह तालिका 
प्रवाह तालिका वस्तुतः एल्गोरिथ्म का चित्रात्मक प्रदर्शन है, जिसमें विभिन्न रेखाओं एवं आकृतियों का प्रयोग किया जाता है जो कि विभिन्न प्रकार के निर्देशों के लिए प्रयोग की जाती है । सामान्यतः सर्वप्रथम एक एल्गोरिथ्म को प्रवाह तालिका के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और फिर प्रवाह तालिका के आधार पर उचित कम्प्यूटर भाषा में प्रोग्राम को तैयार किया जाता है । प्रोग्राम में तार्किक गल्ती एवं शर्तों के पूरा न होने की स्थिति एल्गोरिथ्म एवं प्रवाह तालिका अधिक स्पष्ट हो जाती है ।
प्रवाह तालिका में प्रयुक्त चिन्ह एवं आकृतियां 
1. टर्मिनल – टर्मिनल का प्रयोग प्रोग्राम के प्रारम्भ , समापन और विराम के लिए किया जाता है । यह प्रोग्राम का प्रारम्भ होना और प्रोग्राम का समापन होना प्रदर्शित करता है ।
 
2. इनपुट/आउटपुट – प्रोग्राम में कोई भी इनपुट देने अथवा आउटपुट प्राप्त करने के लिए इनपुट/आउटपुट चिन्ह का प्रयोग किया जाता है । 
3. प्रोसेसिंग – फ्लोचार्ट में प्रोसेसिंग चिन्ह का उपयोग अंकगणितीय प्रक्रिया एवं डाटा विस्थापन सम्बन्धी निर्देशों के लिए किया जाता है । सभी अंकगणितीय प्रक्रिया जैसे जोड़ना, घटाना, गुणा करना और भाग करना प्रवाह तालिका में प्रोसेसिंग चिन्ह द्वारा प्रदर्शित किया जाता है । 
4. प्रवाह रेखाएं – तीर की आकृति सिरे वाली यह रेखाएं प्रोग्राम के प्रवाह को प्रदर्शित करने के लिए की जाती है । प्रोग्राम के प्रवाह को प्रदर्शित करने के निर्देशों के क्रम है जिनके अनुसार निर्देशों का क्रियान्वयन किया जाना है । 
5. निर्णायात्मक – प्रवाह तालिका में निर्णायात्मक चिन्ह का प्रयोग यह दर्शाता है कि यहां पर निर्णय लिया है जिसके दो या दो से अधिक विकल्प हो सके हैं ।Decision Box में निर्णय करने के विशिष्ट मान स्पष्ट रूप से प्रकट किए गए हों । 
6. संयोजक चिन्ह – प्रवाह तालिका में दो प्रकार के Connectors प्रयोग किए जाते हैं –
– ऑन पेज कनेक्टर
-ऑफ पेज कनेक्टर
 
7. पूर्व परिभाषित विश्लेषण चिन्ह – प्रवाह तालिका में यदि पहले की गई प्रोसेसिंग को पुनः किसी अन्य बिन्दु पर प्रयोग करना होता है तो उस बिन्दु पर प्रोसेसिंग सिम्बल के स्थान पर इस चिन्ह प्रयोग किया जाता है । 
3).मिथ्या संकेत 
किसी प्रोग्राम को विकसित करने की प्रक्रिया किए जाने वाले कार्य को समझने एवं कार्य के सम्पन्न होने हेतु तर्क निर्धारण से प्रारम्भ होती है और यह कार्य प्रवाह तालिका अथवा मिथ्या संकेत की सहायता से किया जाता है । मिथ्या संकेत प्रवाह तालिका का एक विकसित विकल्प है । मिथ्या संकेत में विभिन्न आकृतियों अथवा चिन्हों की अपेक्षा प्रोग्राम की प्रक्रिया को क्रम से लिखा जाता है । चूंकि इसका प्रोग्राम को Design करने में महत्वपूर्ण स्थान है अतः इसे प्रोग्राम डिजाइन भाषा भी कहा जाता है ।
प्रवाह तालिका बनाने के नियम
प्रवाह तालिका का निर्माण एक टरमिनल सिम्बल स्टार्ट से प्रारम्भ होता है । प्रवाह तालिका में प्रवाह ऊपर से नीचे एवं बाएं से दायीं ओर होना चाहिए । दो विभिन्न क्रियाएं, किसी एक प्रश्न के दो सम्भावित उत्तरों पर निर्भर करती हैं । ऐसी परिस्थिति में प्रश्न को एक निर्णय चिन्ह में प्रदर्शित करते हैं तथा इन परिस्थितियों को निर्णय चिन्ह से निकलने वाली दो प्रवाह रेखाओं द्वारा जो कि चिन्ह से बाहर की ओर आ रही हैं, प्रदर्शित करते हैं । निर्णय चिन्ह में एक प्रवाह रेखा आनी चाहिए और सभी सम्भावित उत्तरों के लिए पृथ्क रेखा होनी चाहिएं । 
प्रत्येक चिन्ह में दिए गए निर्देश स्पष्ट एवं पूर्ण होने चाहिए ताकि उसे पढ़कर समझने में कठिनाई न हो । प्रवाह तालिका में प्रयुक्त नाम एवं परिवर्तनांक एक रूप होने चाहिएं ।यदि प्रवाह तालिका बड़ी हो गई है और उसे अगले पृष्ठ पर भी बनाया जाना है तो प्रवाह तालिका को इन्पुट अथवा आउटपुट सिम्बल पर ही तोड़ना चाहिए तथा उपयुक्त कनेक्टर का प्रयोग करना चाहिए । प्रवाह तालिका जहां तक सम्भव हो अत्यन्त साधारण होनी चाहिए । प्रवाह रेखाएं एक-दूसरे को काटती हुई नहीं होनी चाहिएं । यदि ऐसी परिस्थिति आती है तो उपयुक्त कनेक्टर का प्रयोग करना चाहिए । प्रोसेस सिम्बल में केवल एक ही प्रवाह रेखा आनी चाहिए और एक ही प्रवाह रेखा निकलनी चाहिए । नीचे से ऊपर की ओर जाने वाली प्रवाह रेखा या तो किसी विश्लेषण की पुनरावृत्ति अथवा लूप को प्रदर्शित करनी चाहिए ।

डी.ओ.स. डोस (डिस्क ऑप्रेटिंग सिस्टम)
वैज्ञानिकों के अलावा साधारण उपभोक्ताओं के लिये एक ऑपरेटिंग सिस्टम की शुरुआत की गयीं जिसका नाम डी.ओ.स. –डोस (डिस्क ऑप्रेटिंग सिस्टम) रखा गया. यह ऑप्रेटिंग सिस्टम कंसोल मोड आधारित था, अर्थात इसमें माउस का उपयोग नहीं होता था न ही इसमें ग्राफ़िक से सम्बंधित कोई काम हो सकता था. इसमें फाइल और डायरेक्टरी बनाया जा सकता था जिसमे हम टेक्स्ट को सुरक्षित कर के रख सकते थे और पुनः उपयोग भी कर सकते थे.

डी.ओ.स. पूर्णतः आदेश (COMMAND) पर आधारित होता था. आदेश के दुवारा ही कंप्यूटर को निर्देशित कर सकते थे. जिन्हें जितना आदेश याद होता था उसे उतना ही जानकार माना जाता था. आदेश (COMMAND)- यह कंप्यूटर को निर्देशित करने का तरीका होता हैं. पहले ही कंप्यूटर को यह बतला दिया जाता है की निम्न शब्द का प्रयोग करने से निम्न प्रकार का ही काम करना हैं. और जब कोई उपभोक्ता बस उस आदेश को लिखता हैं तो कंप्यूटर स्वतः उस काम को निष्पादित करता हैं.

डी.ओ.स. को ऑप्रेटिंग सिस्टम का माँ भी कहा जाता हैं, क्योंकि हम आज जिस भी ऑप्रेटिंग सिस्टम का उपयोग करते हैं उसका मुख्य आधार डी.ओ.स. ही होता हैं. बाद के समय में मायक्रोसॉफ्ट कंपनी ने इसे खरीद लिया, उसके बाद इसे ऍम.एस.डी.ओ.स. के नाम से जाना जाने लगा. हम यहाँ डी.ओ.स. के कमांडो का ज्यादा चर्चा नहीं करेंगे क्योंकि आज हम प्रत्यक्ष रूप से इसका उपयोग नहीं करते हैं.

सबसे पहले हम चर्चा करेगे की प्रोम्प्ट क्या होता हैं?

डी.ओ.स. में साधारणतया हमें “C:\>_” प्रकार की आकृति बनी हुई दिखाई पड़ती हैं. जब हम डी.ओ.स. खोलते हैं तो स्क्रीन के बायीं ओर यह दिखलाई पड़ता हैं.
जहाँ-
C: यह बतलाता है कि हम हार्डडिस्क के किस भाग में हैं. सामान्यतः हार्डडिस्क C: D: E: में और फ्लॉपी A: के तौर पर दिखाई पड़ता हैं. यह क्रम कोई जरुरी नहीं होता.
\ यह बतलाता हैं कि हम किस डायरेक्टरी में हैं. डायरेक्टरी उस स्थान को कहा जाता हैं जहाँ हम फाइल को सुरक्षित रखते हैं, और फाइल हम उसे कहते हैं जिसके अंतर्गत सूचनाओं को रखा जाता हैं. दूसरे शब्दों में अगर कहें तो हम जो साधारण कॉपी पर लिखते हैं उससे फाइल कहा जाता हैं और उस कॉपी को सहेज कर रखने के लिये जो आलमारी या रैक का उपयोग किया जाता हैं उससे डायरेक्टरी कहते हैं.
> यह बतलाता हैं कि मुख्य जानकारी यहाँ समाप्त हुई.
_ यह टिमटिमाता छोटा लाइन कर्सर के नाम से जाना जाता हैं. यह जहाँ भी दिखता हैं उसका मतलब हुआ की हम उस जगह पर कुछ लिख सकते हैं.

कम्प्यूटर की विशेषताएँ

प्रत्येक कम्प्यूटर की कुछ सामान्य विशेषताएँ होती है । कम्प्यूटर केवल जोड करने वाली मशीन नही है यह कई जटिल कार्य करने मे सक्षम है।कम्प्यूटर की निम्न निशेषताएँ है। 
वर्ड-लेन्थ
डिजिटल कम्प्यूटर केवल बायनरी डिजिट पर चलता है। यह केवल 0 एवं 1 की भाषा समझता है। आठ बिट के समूह को बाइट कहा जाता है । बिट की संख्या जिन्हे कम्प्यूटर एक समय मे क्रियान्वित करता है वर्ड लेंन्थ कहा जाता है । सामान्यतया उपयोग मे आने वाले वर्ड लेन्थ 8,16,32,64 आदि है। वर्ड लेन्थ के द्वारा कम्प्यूटर की शक्ति मापी जाती है।
तीव्रता
कम्प्यूटर बहुत तेज गति से गणनाएँ करता है माइक्रो कम्प्यूटर मिलियन गणना प्रति सेकंड क्रियांवित करता है। 

संचित युक्ति
कम्प्यूटर की अपनी मुख्य तथा सहायक मेमोरी होती है। जो कि कम्प्यूटर को आंकडो को संचित करने मे सहायता करती है । कम्प्यूटर के द्वारा सुचनाओ को कुछ ही सेकंड मे प्राप्त किया जा सकता है । इस प्रकार आकडो को संचित करना एवं बिना किसी त्रुटि के सुचनाओ को प्रदान करना कम्प्यूटर की महत्वपूर्ण विशेषता है 
शुद्धता
कम्प्यूटर बहुत ही शुद्ध मशीन है । यह जटिल से जटिल गणनाएँ बिना किसी त्रुटि के करता है ।
वैविघ्यपूर्ण
कम्प्यूटर एक वैविघ्यपूर्ण मशीन है यह सामान्य गणनाओ से लेकर जटिल से जटिल गणनाएँ करने मे सक्षम है । मिसाइल एवं उपग्रहो का संचालन इन्ही के द्वारा किया जाता है। दूसरे शब्दो मे हम कह सकते है कि कम्प्यूटर लगभग सभी कार्यो को कर सकता है एक कम्प्यूटर दूसरे कम्प्यूटर से सुचना का आदान प्रदान कर सकता है । कम्प्यूटर की आपस मे वार्तालाप करने की क्षमता ने आज ईंटरनेट को जन्म दिया है ।जो कि विश्व का सबसे बडा नेटवर्क है ।
स्वचलन
कम्प्यूटर एक समय मे एक से अधिक कार्य करने मे सक्षम है ।
परिश्रमशीलता
परिश्रमशीलता का अर्थ है कि बिना किसी रूकावट के कार्य करना । मानव जीवन थकान ,कमजोरी,सकेन्द्रण का आभाव आदि से पिडित रङता है।मनुष्य मे भावनाए ङोती है वे कभी खुश कभी दुखी होते है । इसलिए वे एक जैसा काम नही कर पाते है । परंतु कम्प्यूटर के साथ ऐसा नही है वह हर कार्य हर बार बहुत ही शुद्धता एवं यथार्थता से करता है .
इन्टरनेट का उपयोग 
सामान्यतया  इन्टरनेट प्रयोक्ता केवल वर्ड-वाइड-वेब को ही इन्टरनेट का एकमात्र संसाधन समझता हैं. परन्तु सत्य यह हैं कि इन्टरनेट के दुवारा वेब उपयोग तथा ई-मेल के अतिरिक्त भी अन्य महत्वपूर्ण सेवाएं प्राप्त की जा सकती हैं. इन सेवाओं में से कुछ सेवाओं का संछिप्त विवरण यहाँ प्रस्तुत हैं-
फ़ाइल ट्रान्सफर प्रोटोकॉल – फ़ाइल ट्रान्सफर प्रोटोकॉल का उपयोग एक कंप्यूटर नेटवर्क से किसी दूसरे कंप्यूटर नेटवर्क में फ़ाइल को भेजने करने के लिए किया जाता हैं. इस प्रोटोकॉल के दुवारा सर्वर से किसी अन्य कंप्यूटर पर फाईल भी कॉपी की जा सकती हैं.
इलेक्ट्रोनिक मेल-इलेक्ट्रॉनिक मेल को संछिप्त  रूप से ई-मेल कहा जाता हैं. इस माध्यम के दुवारा आप बड़ी से बड़ी सूचनाओ तथा संदेशों को इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली दुवारा प्रकाश की गति से भेज या प्राप्त कर संकते हैं. ई-मेल दुवारा पत्र, ग्रीटिंग व कंप्यूटर के प्रोग्राम को दुनिया के किसी भी कोने से किसी भी हिस्से में भेज सकते हैं. इसके बारे में हम आगे और भी विस्तार से पढेंगे.
गोफर- गोफर का अविष्कार अमेरिका के मिनिसोटा नामक विश्वविद्यालय में हुआ था. यह एक यूजर फ्रेंडली इंटरफेस हैं, जिसके माध्यम से यूजर इन्टरनेट पर प्रोग्राम तथा सूचनाओं का अदान-प्रदान कर सकता हैं. गोफर यूजर की वांछित सूचनाओं तथा प्रोग्राम को खोज कर यूजर के सामने रख देता हैं. इसका प्रयोग अत्यंत सरल हैं.
वर्ल्ड-वाइड-वेब -इन्टरनेट  का सबसे महत्वपूर्ण संसाधन वर्ल्ड-वाइड-वेब  को समझा जाता हैं. इसे संछिप्त में ३ डब्लू www के दुवारा प्रदर्शित किया जाता हैं. वर्ल्ड-वाइड-वेब  के दुवारा यूजर अपना या अपनी संस्था का वेब पेज बना कर नेट पर रख सकता हैं. जिसे फिर दुनिया के किसी भी कोने से देखा जा सकता हैं.
टेलनेट – डाटा के हस्तांतरण के लिए टेलनेट का उपयोग किया  जाता हैं. इस प्रोटोकॉल के इस्तेमाल से हम कहीं दूर अन्यत्र रखें कंप्यूटर पर अपना डाटा भेज या मंगवा सकते हैं. हम दूरस्थ कंप्यूटर को कण्ट्रोल भी  कर सकते हैं.
वेरोनिका – विरोनिका प्रोटोकॉल गोफर के माध्यम से काम करता हैं. इसके उपयोग से डाटाबेस तक पंहुचा जाता हैं.

प्रचलित डोमेन एवं उनसे जुड़े क्षेत्र
  • .edu – पढाई वाली संस्थानों से जुड़े साइट्स के लिए
  • .net – नेटवर्क संस्थानों से जुड़े साइट्स के लिए
  • .int- अन्तर्राष्ट्रीय संस्थानों से जुड़े साइट्स के लिए
  • .org- एसी संस्थानों से जुड़े साइट्स के लिए जो पैसे के लिए काम नहीं करते
  • .mil- सैन्य संस्थानों से जुड़े साइट्स के लिए
  • .jobs- नौकरी देने वाले संस्थानों से जुड़े साइट्स के लिए
  • .gov- सरकारी संस्थानों से जुड़े साइट्स के लिए
  • .com- व्यपारिक संस्थानों से जुड़े साइट्स के लिए
  • .name- एक व्यक्ति विशेष के लिए
  • .pro- एक प्रोफेशनल जैसे – डॉक्टर, प्रोफेसर वकील आदि के लिए
  • .in- भारतीय साइट्स के लिए
  • .uk- लन्दन के साइट्स के लिए एवम अन्य

हम देखेंगे की कंप्यूटर पर इन्टरनेट शुरू करने से पहले हमें किन-किन चीजों की आवश्यकता होती हैं-
–    कंप्यूटर या मोबाइल (जो G.P.R.S सपोर्ट करता हो )
–    टेलीफोन या मोबाइल सीम कार्ड
–    मोडेम
–    सॉफ्टवेयर जिसके मदद से इंटरनेट पर काम किया जाता हैं.
कंप्यूटर या मोबाइल (जो G.P.R.S सपोर्ट करता हो )- बाजार में मिलने वाले घरेलू उपयोग वाले सभी कंप्यूटर को इन्टरनेट से जोड़ा जा सकता हैं. अगर आप अपने मोबाइल में इन्टरनेट का उपयोग करना चाहते हैं तो मोबाइल लेने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना जरुरी हैं की वह मोबाइल फोन G.P.R.S सपोर्ट करता हैं या नहीं. बस जो फोन G.P.R.S सपोर्ट कर सकता हैं उसी में इन्टरनेट का उपयोग किया जा सकता हैं.
 
टेलीफोन या मोबाइल सीम कार्ड- कंप्यूटर दुवारा बनने वाले डिजिटल सिग्नल को टेलीफ़ोन लाइन वाले एनालोग सिग्नल के माद्यम से ही एक जगह से दूसरे जगह भेजा जाता हैं. इस कारण इन्टरनेट के इस्तेमाल के लिए एक फोन लाइन का होना अतिआवश्यक होता हैं. नया फोन लेते वक्त कुछ खास बातों पर ध्यान देना होता हैं –
–    हम जिस कंपनी का फोन लेने जा रहे हैं वह इन्टरनेट सेवा प्रदान करता हैं या नहीं,
–    कंपनी स्वयं मोडेम प्रदान करता हैं या नहीं
–    कंपनी किस प्रकार का सेवा मुहैया करवाता हैं जैसे ब्रोड्बैंड, डायलअप, लीज्ड लाइन आदि.
–    फोन प्रदाता कम्पनी किस प्रकार अपना बिल लेता हैं मसलन मासिक चार्ज कितना लेती हैं, उसमे कितना डाउनलोड्स मुफ्त मिलता हैं, अतरिक्त डाउनलोड होने पर चार्ज कितना लिया जाता हैं. आदि
मोबाईल में डिजिटल सिग्नल को टेलीफ़ोन लाइन वाले एनालोग सिग्नल के माद्यम से एक जगह से दूसरे जगह भेजने के लिए सीम कार्ड का उपयोग किया जाता हैं. मोबाईल में सीम कार्ड लेते वक्त ये जानकारी प्राप्त करना जरुरी होता हैं की सीम कार्ड वाली कंपनी इन्टरनेट सेवा देती हैं या नहीं, और देती हैं तो उसके चार्ज कितने होते हैं.
मोडेम–  अगर फोन प्रदाता कंपनी आपको मोडेम प्रदान नहीं कर रहीं हैं तो आपको बाजार से मोडेम खरीदना होगा. यहाँ आपको इस बात पर ध्यान देना होगा की फोन सेवा देने वाली कंपनी अधिकतम कितने स्पीड का इन्टरनेट सेवा प्रदान करती हैं, उसी के आधार पर आपको मोडेम लेना पड़ता हैं.
मोबाईल फोन जिसमे G.P.R.S सुविधा होती हैं मोडेम आंतरिक तौर पर ही लगा होता हैं. इस कारण हम मोबाइल में तो इन्टरनेट उपयोग कर ही सकते हैं इसके साथ ही हम मोबाइल को कंप्यूटर से जोड़ कर फोन और मोडेम जैसा भी ऊपयोग कर सकते हैं.
इसके साथ ही बाजार में बहुत डेटा कार्ड भी उपलब्ध हैं जिसका उपयोग हम सीधे तौर पर मोडेम और टेलीफोन जैसा कर सकते हैं. इसमें भी मोबाईल जैसे टेलीफ़ोन और मोडेम दोनों का एक साथ उपयोग करने के लिए सीम कार्ड की जरुरत होती हैं. डेटा कार्ड भी मोबाइल जैसा मुख्यतः दो प्रकार का होता हैं
सॉफ्टवेयर जिसके मदद से इंटरनेट पर काम किया जाता हैं-
इन्टरनेट पर काम करने के लिए एक विशेष प्रकार के अप्लीकेशन सॉफ्टवेयर की आवश्यकता होती हैं. जिसके उपयोग से ही हम इन्टरनेट पर काम कर सकते हैं. इस सॉफ्टवेयर की और अधिक जानकारी के लिए देखे – इन्टरनेट सॉफ्टवेयर या वेब ब्राउजर

जब उपरोक्त सभी सामग्री उपलब्ध हो जाय तब ही इन्टरनेट प्रारम्भ करना सम्भव हो सकता हैं.

मोबाईल से कंप्यूटर पर इंटरनेट चलाना
जब मोबाईल पर इन्टरनेट प्रारम्भ हो जाती हैं तो हम उस मोबाईल का उपयोग मोडेम की तरह करके उसे कंप्यूटर से भी जोड़ सकते हैं और कंप्यूटर पर भी इन्टरनेट का उपयोग कर सकते हैं. सबसे पहले हमें मोबाईल और कंप्यूटर में सम्बन्ध स्थापित करना होगा.
अगर तार के माद्यम से कर रहे है तो-
स्टेप एक – अगर कंप्यूटर में ओपरेटिंग सिस्टम विन्डोज़ एक्स० पी० हैं तो मोबाईल के साथ मिलने वाले सी० डी० को एक बार अपने कंप्यूटर में ऑटो रन करवाना होगा. चूकी जब हम कंप्यूटर में कोई नया हार्डवेयर को जोड़ते हैं तो कंप्यूटर को सॉफ्टवेयर की मदद से ये बतलाना होता हैं कि आखिर उस नए हार्डवेयर का काम क्या हैं और ये कैसे काम करेगा. इस सॉफ्टवेर को ड्राईवर सॉफ्टवेर कहा जाता हैं. और अगर कंप्यूटर में ओपरेटिंग सिस्टम विन्डोज़ सेवेन  हैं तो इसकी जरुरत नहीं होती क्यूँकि विन्डोज़ सेवेन में अधिकांश ड्राईवर सॉफ्टवेर पहले से डाला हुआ रहता हैं.
स्टेप दो– जब कंप्यूटर में एक बार सि०डी० चल जाता हैं तो कंप्यूटर को रिस्टार्ट कर देंगे और मोबाईल के साथ मिले तार का एक छोर कंप्यूटर में और दूसरा छोर मोबाईल में जोड़ कर हार्डवेयर अच्छे से जुड़ने का सन्देश आने का इंतजार करेंगे. अगर सब कुछ सही रहा तो नोटीफिकेशन बार (डेस्कटॉप कि एसी जगह जहाँ समय दिखता हैं) पर एक सन्देश आयेगा कि हार्डवेयर सही तरीके से जुड गया हैं और अब आप इसका इस्तेमाल कर सकते हैं.
इस दो स्टेप के करने से ही आपका मोबाईल कंप्यूटर से जुड़ जाता हैं. ऊपर का ये दोनों स्टेप सभी मोबाईल के लिए एक ही होता हैं परन्तु इससे आगे का काम अलग अलग मोबाईल में अलग अलग तरीके से होता हैं. सभी मोबाइल्स सॉफ्टवेयर में जो खास बातें ध्यान रखनी हैं वो हैं- हम मोबाईल जोड़ने के बाद उस मोबाईल सॉफ्टवेयर को खोल लेंगे उसके सेटिंग में जा कर हम जिस कम्पनी का सीम इस्तेमाल कर रहे हैं उसका APN और डायलअप नंबर डालेंगे. APN और डायलअप नंबर हमे उस सीम कम्पनी के ग्राहक सेवा केन्द्र से बात करने पर मिल जाएगा. इस प्रक्रिया के बाद इसी सॉफ्टवेयर से दुवारा इंटरनेट कनेक्ट किया जा सकता हैं.
 अगर ब्लूटूथ से कर रहे है तो-
स्टेप एक – पहले यह सुनिश्चित करना होता हैं कि कंप्यूटर और मोबाईल दोनों में  ब्लूटूथ हैं या नहीं.  ब्लूटूथ से जोड़ने के लिए दोनों में  ब्लूटूथ होना अतिआवश्यक होता हैं. अगर कंप्यूटर में ब्लूटूथ में नहीं हैं तो बाजार से अलग से  ब्लूटूथ खरीदना होता हैं. और अगर मोबाईल में नहीं हैं तो फिर  ब्लूटूथ युक्त मोबाईल लेना होता हैं. अलग से लिए गए  ब्लूटूथ को कंप्यूटर में लगा कर एक बार उसका ड्राईवर सॉफ्टवेर कंप्यूटर में चलाना होगा. जब ये प्रक्रिया पूरी होती हैं तो नोटीफिकेशन बार पर एक आइकन बन जाएगा.
स्टेप दो– मोबाईल में  ब्लूटूथ को ओन् कर लेंगे. उसके बाद नोटीफिकेशन बार वाले ब्लूटूथ आइकन को ओपन करके न्यू डिवाइस सर्च करेंगे. जब  ब्लूटूथ सॉफ्टवेर में मोबाईल का आइकन बन जायगा तब पैरिंग का काम करेंगे. इस प्रक्रिया में कंप्यूटर पर कोई अंक दबाना होता हैं फिर उसी अंक को मोबाईल पर दबाना होता हैं. इससे यह सुनिश्चित किया जाता हैं कि डाटा अदान प्रदान करने के लिए दोनों डिवाइस तेयार हैं या नहीं या कोई अन्य उपकरण तो दोनों के बीच में नहीं आ रहा. जब यह सम्पन होती हैं तो हम मोबाईल को सीरियल पोर्ट के तौर पर कांनेक्ट कर देंगे.
इस दो स्टेप के करने से ही आपका मोबाईल कंप्यूटर से जुड़ जाता हैं. फिर ब्लूटूथ आप्शन में डायलअप का इस्तेमाल करके इन्टरनेट प्रारम्भ किया जाता हैं.