Saturday, 30 January 2016

मोड्युलेशन
यह किसी जानकारी को लंबी दूरी तक सिग्नल के रूप में भेजने के लिए उपयोग होता हैं. मोड्युलेशन डिजिटल सिग्नल को एनालॉग रूप में बदलने की प्रक्रिया हैं. यह मोडेम (MODEM- Modulator Demodulator) के दुवारा संभव होता हैं. मोडेम एक विद्युत यंत्र हैं जो डिजिटल सिग्नल को एनालॉग मे और एनालॉग सिग्नल को डिजिटल सिग्नल मे बदलने का काम करता हैं.
मोड्युलेशन तीन प्रकार के होते है-
१. आयाम (Amplitude) मोड्युलेशन (AM)- इस प्रक्रिया में वाहक सिग्नल का आयाम सूचना युक्त डिजिटल सिग्नल के अनुरूप बदला जाता हैं.
२. आवृति (Frequency) मोड्युलेशन (FM)- इस प्रक्रिया में वाहक सिग्नल की आवृति को सूचना युक्त डिजिटल सिग्नल के अनुरूप बदला जाता हैं.
३.- चरण (Phase) मोड्युलेशन (PM)-इस प्रक्रिया में वाहक सिग्नल के फेज को डिजिटल सिग्नल के अनुरूप बदला जाता हैं.


नेटवर्क इंटरफेस कार्ड
यह एक हार्डवेयर डिवाइस हैं जो कंप्यूटर को नेटवर्क में संचार स्थापित करने में सहायता प्रदान करता हैं. नेटवर्क के अंतर्गत कंप्यूटर एक निश्चित प्रोटोकॉल (कोई काम करने का पूर्व से निर्धारित एक नियम) के तहत डाटा पैकेट को आपस में आदान प्रदान करता हैं.
वायरलेस तकनीक
जैसा कि नाम से ज्ञात होता हैं यह बिना तारो कि तकनीक हैं. अर्थार्त इसके द्वारा डेटा का परिवहन बिना तारों या केबल के होता हैं. इस तकनीक के प्रयोग से केबल में होने वाले खर्च की भी बचत होती हैं. इस तकनीक में केबल के स्थान पर इलेक्ट्रोमग्नेटिक तरंगे, माइक्रोवेव, इन्फ्रारेड आदि के दुवारा डाटा का परिवहन होता हैं. वायरलेस तकनीक के अनुप्रयोग निम्नलिखित हैं- टेलीविजन रिमोट, मोबाइल फोन, वाई-फाई आदि.
वाई-मेक्स
यह एक डिजिटल वायरलेस संचार प्रणाली हैं. यह तकनीक बिना केबल के ७५ मेगाबाइट / सेकंड ब्रॉडबैंड स्पीड प्रदान करती हैं.
वायरलेस लोकल लूप
यह एक वायरलेस संचार प्रणाली हैं जिसमे उपभोक्ता नेटवर्क से रेडियो आवृत्ति के प्रोयोग से जुड़ते हैं. यह एक बेहतर आवाज तथा उच्च गति डेटा क्षमता प्रदान करता हैं. जिस स्थान पर लैंड लाइन टेलीफोन का प्रवाधान नहीं हैं उस जगह वायरलेस लोकल लूप काकिया जाता हैं. यह CDMA तकनीक पर आधारित होता हैं.


इन्टरनेट सॉफ्टवेयर या वेब ब्राउजर
वेब एक विशाल पुस्तक की तरह हैं तथा वेब ब्राउजर एक सोफ्टवेयर हैं जो कंप्यूटर को इन्टरनेट से जोड़ता हैं. कुछ वेब ब्राउजर निम्नलिखित हैं-
१.       नेटस्केप नेविगेटर
२.       माइक्रोसॉफ्ट इंटरनेट एक्सप्लोरर
३.       मोजिला फ़ायरफोक्स
४.       गूगल क्रोम
५.      ओपेरा आदि
इन सोफ्टवेयर का उपयोग कर हमलोग इन्टरनेट से जुड़ सकते हैं, तथा वेब से अपनी पसंद की जानकारियाँ प्राप्त कर सकते हैं. वेब ब्राउजर का प्रयोग कर हम लोग किसी विशेष पेज या लोकेशन पर उसके पता (Address) को टाइप कर जा सकते हैं. URL (Universal resources locater) में प्रयुक्त हो रहे टूल्स और इन्टरनेट पता दोनों रहता हैं. जैसे – URLhttp://www.samidhafoundation.co.cc में टूल्स http (hypertext transfer protocol- यह एक प्रोटोकॉल अर्थार्त एक पूर्व से निर्धारित नियम हैं जिसका काम संकेत को दिए गए इन्टरनेट पता पर भेजना हैं) हैं और इंटरनेट पता www.samidhafoundation.co.cc हैं.

इन्टरनेट

इन्टरनेट शब्द को अगर दो भागो मे बाँट दिया जाये तो इंटरनेशनल + नेटवर्क दो शब्द बनते हैं, और दोनों शब्दों का मतलब निकाला जाये तो इसका अर्थ आता हैं अन्तर्राष्ट्रीय जाल अर्थात ऐसा जाल जिसमे सम्पूर्ण संसार शामिल हो.
इंटरनेट दुनिया भर में सार्वजनिक रूप से सुलभ कंप्यूटर के सुपर नेटवर्क है. इंटरनेट नेटवर्क  मे हजारों की  संख्या मे पूरी दुनिया के कंप्यूटर जुड़े हुए हैं|
इंटरनेट का सफर, १९७० के दशक में, विंट सर्फ (Vint Cerf) और बाब काहन् (Bob Kanh) ने शुरू किया गया। उन्होनें एक ऐसे तरीके का आविष्कार किया, जिसके द्वारा कंप्यूटर पर किसी सूचना को छोटे-छोटे पैकेट में तोड़ा जा सकता था और दूसरे कम्प्यूटर में इस प्रकार से भेजा जा सकता था कि वे पैकेट दूसरे कम्प्यूटर पर पहुंच कर पुनः उस सूचना कि प्रतिलिपी बना सकें – अथार्त कंप्यूटरों के बीच संवाद करने का तरीका निकाला। इस तरीके को ट्रांसमिशन कंट्रोल प्रोटोकॉल {Transmission Control Protocol (TCP)} कहा गया।
सूचना का इस तरह से आदान प्रदान करना तब भी दुहराया जा सकता है जब किसी भी नेटवर्क में दो से अधिक कंप्यूटर हों। क्योंकि किसी भी नेटवर्क में हर कम्प्यूटर का खास पता होता है। इस पते को इण्टरनेट प्रोटोकॉल पता {Internet Protocol (I.P.) address} कहा जाता है। इण्टरनेट प्रोटोकॉल (I.P.) पता वास्तव में कुछ नम्बर होते हैं जो एक दूसरे से एक बिंदु के द्वारा अलग-अलग किए गए हैं।
सूचना को जब छोटे-छोटे पैकेटों में तोड़ कर दूसरे कम्प्यूटर में भेजा जाता है तो यह पैकेट एक तरह से एक चिट्ठी होती है जिसमें भेजने वाले कम्प्यूटर का पता और पाने वाले कम्प्यूटर का पता लिखा होता है। जब वह पैकेट किसी भी नेटवर्क कम्प्यूटर के पास पहुंचता है तो कम्प्यूटर देखता है कि वह पैकेट उसके लिए भेजा गया है या नहीं। यदि वह पैकेट उसके लिए नहीं भेजा गया है तो वह उसे आगे उस दिशा में बढ़ा देता है जिस दिशा में वह कंप्यूटर है जिसके लिये वह पैकेट भेजा गया है। इस तरह से पैकेट को एक जगह से दूसरी जगह भेजने को इण्टरनेट प्रोटोकॉल {Internet Protocol (I.P.)} कहा जाता है।
अक्सर कार्यालयों के सारे कम्प्यूटर आपस में एक दूसरे से जुड़े रहते हैं और वे एक दूसरे से संवाद कर सकते हैं। इसको Local Area Network (LAN) लैन कहते हैं। लैन में जुड़ा कोई कंप्यूटर या कोई अकेला कंप्यूटर, दूसरे कंप्यूटरों के साथ टेलीफोन लाइन या सेटेलाइट से जुड़ा रहता है। अर्थात, दुनिया भर के कम्प्यूटर एक दूसरे से जुड़े हैं। इण्टरनेट, दुनिया भर के कम्प्यूटर का ऎसा नेटवर्क है जो एक दूसरे से संवाद कर सकता है।


कंप्यूटर बूटिंग

कंप्यूटर को ऑन/ऑफ करने की प्रक्रिया को बूटिंग के नाम से जाना जाता है. यह प्रत्येक कंप्यूटर के सबसे पहली प्रक्रिया होती हैं. एक पर्सनल कंप्यूटर में सामान्यतः केंद्रीय प्रसंस्करण इकाई (सीपीयू) के डब्बे में ऑन/ऑफ का बटन होता है जिसे दबा कर हम कंप्यूटर को बूट करते हैं.
बूटिंग दो प्रकार के होते हैं-
१)      कोल्ड बूटिंग
२)     वार्म बूटिंग
ऑन/ऑफ बटन दबा कर कंप्यूटर को खोलने की क्रिया को कोल्ड बूटिंग कहा जाता हैं. अगर कंप्यूटर खुल गया हो परन्तु ऑफ न हो रहा हो या कोई प्रोग्राम फस गया हो तो कंप्यूटर को की-बोर्ड के Alt+Ctrl+Del दबा कर या फिर रिस्टार्ट बटन का उपयोग कर कंप्यूटर को बंद किया जाता हैं, यह प्रक्रिया को वार्म बूटिंग के नाम से जाना जाता है.



विन्डोज़ की आन्तरिक/बाह्य एप्लिकेशन (सोफ्टवेयर)
जब कंप्यूटर मे ओपरेटिंग सिस्टम के तौर पर विन्डोज़ को लोड किया जाता है तो उसके साथ काम करने के लिए आवश्यक सोफ्टवेयर खुद ब् खुद लोड हो जाता है वहीँ विन्डोज़ का आन्तरिक एप्लिकेशन (सोफ्टवेयर) कहलाता है और जो सोफ्टवेयर विंडोज के लोड हो जाने के बाद अलग से किसी अन्य माध्यम से कंप्यूटर मे डाला जाता हैं उसे बाह्य एप्लिकेशन (सोफ्टवेयर) कहा जाता हैं.
आन्तरिक एप्लिकेशन के उदाहरण के लिए

MS-PAINT*                      – इस एप्लिकेशन का उपयोग चित्र बनाने के लिए किया जाता हैं.

CALCULATOR*               – अंकीय जोड़-घटा करने के लिए कैलकुलेटर का उपयोग किया जाता हैं.

INTERNET EXPLORER*        – इंटरनेट पर काम करने के लिए इस सॉफ्टवेर का उपयोग किया जाता हैं.

WINDOWS MULTIMEDIA*     – गाना-विडियो सुनने और देखने के लिए इस सॉफ्टवेर का उपयोग किया जाता हैं.

WINDOWS MOVIE MAKER*    – विडियो मे कुछ फेर बदल करने के लिए या जोड़ने आदि के लिए इस सॉफ्टवेर का उपयोग किया जाता हैं.

NOTEPAD*                  – यह एक टेक्स्ट एडिटर प्रोग्राम होता हैं, अर्थात इसके अंतर्गत लिखने आदि का काम होता हैं. यह प्रोग्राम दिखाने मे जितना साधारण लगता है उससे बहुत ज्यादा शक्तिशाली प्रोग्राम होता है. एसा कोई भी कंप्यूटर भाषा जिसे कमपईल करने की आवश्कता नहीं होती उसे नोटपेड पर लिखा जा सकता है जैसे                  HTML – (Hyper Text Markup Language*)
WORDPAD*                                       – यह भी एक टेक्स्ट एडिटर प्रोग्राम है जिसके अंतर्गत हम कोई पत्र या शब्दों से संबन्धित किसी काम को सम्पादित कर सकते हैं. इसके प्रयोग से हम साधारण टाइप राइटर्स की तुलना मे कहीं अच्छे तरीके से लिखने का काम कर सकते है.

बाह्य एप्लिकेशन के उदाहरण के लिए
MS OFFICE*                                       – यह एक बहुत उपयोगी प्रोग्राम का बण्डल है जिसके अंतर्गत लिखनेवाला काम तो होता ही है साथ ही साथ स्प्रेडशीट्स और प्रेसेंटेशन का भी काम होता हैं. स्प्रेडशीट्स का मतलब हुआ एक प्रकार का व्यापारिक लिखा जोखा वाला काम और प्रेसेंटेशन का मतलब हुआ लिखे हुए काम को दूसरों के पास दिखलाने का तरीका.
OUTLOOK*           – इस सोफ्टवेयर का प्रयोग इंटरनेट से मेल भेजने या मंगवाने के लिए किया जाता हैं. इसमें एक बार मेल आने के बाद पुनः उसे पढ़ने के लिए इन्टरनेट कनेक्शन की अवश्यकता नहीं होती.

PHOTOSHOP*        – चित्र से सम्बंधित वृहत काम के लिए इस सोफ्टवेयर का प्रयोग किया जाता हैं.

COREL DRAW*        – लोगो डिजाइन से सम्बंधित काम के लिए इस सोफ्टवेयर का प्रयोग किया जाता हैं.

FLASH*              – चलंत चित्र (Animation) बनाने के लिए इस सोफ्टवेयर का प्रयोग किया जाता हैं.

PAGE MAKER*        – पत्र डिजाइन से सम्बंधित काम के लिए इस सोफ्टवेयर का प्रयोग किया जाता हैं.

.NET*                – स्वयं का अलग काम करने के लिए प्रयुक्त होने वाले प्रोग्राम को बनाने के लिए से सम्बंधित काम के लिए इस सोफ्टवेयर का प्रयोग किया जाता हैं.

ORACLE       *             – डाटाबेस के लिए इस सोफ्टवेयर का प्रयोग किया जाता हैं. डाटाबेस का अर्थ हुआ एसी जगह जहाँ हम अपने डाटा को सुसज्जित तरीके से पुनः प्रयोग मे लाने के लिए रखते हैं. जैसे अगर हमे किसी विद्यार्थी का डाटा रखना है तो उससे जुड़ी बहुत सी जानकारी रखना होता है जैसे उसका नाम, क्लास, पिता का नाम, घर का पता इत्यादि.
नोट- जहां जहां * हैं उसका मतलब हैं की हम उसकी चर्चा आगे बहुत विस्तार से करेंगे

(Data Communication)

डेटा संचार (Data Communication)
डेटा संचार दो या दो से अधिक कंप्यूटर केन्द्रों के बीच डिजिटल (ऐसी प्रणाली जिसमे मुख्य से डाटा अदान-प्रदान के लिए अंक का उपयोग किया जाता है) या एनालॉग (ऐसी प्रणाली जिसमे विद्युत संकेतों का प्रयोग डाटा अदान-प्रदान के लिए किया जाता है) डेटा का स्थान्तरण है, जो आपस मे संचार चेनल से जुड़ा होता है.
डेटा संचार के लाभ
–    डेटा को भौतिक रूप से भेजने मे तथा सेट तैयार करने मे लगने वाले समय की बचत
–    आधुनिक कंप्यूटर के प्रोसेसिंग शक्ति तथा संग्रहण क्षमता का पूर्ण उपयोग.
–    फाइल से सूचनाओं की तीव्र प्राप्ति.
–    फाइलों के नक़ल से बचाव
–    कम खर्च मे डेटा का अदान-प्रदान
संचार चेनल के प्रकार –
१. सिम्पलेक्स चेनल (Simplex Channel) –
A————>B
इसमें डाटा का प्रवाह बस इक ही दिशा मे होता है. जैसे – रेडियो स्टेशन से रेडियो सिग्नल श्रोताओं के पास पहुचता है, पर श्रोता वापस उस सिग्नल को रेडियो स्टेशन नहीं भेज सकता. इसमें सिग्नल बस A से B की दिशा मे ही जाता है.
२. अर्द्ध डुप्लेक्स चेनल (Half Duplex Channel)-
————————->
A                                              B
<————————-
इस चेनल मे डाटा का प्रवाह दोनों दिशाओ मे होता है. परन्तु एक समय मे किसी एक ही दिशा मे डाटा का प्रवाह होता है. अर्थात A से  B की ओर या फिर  B से  A की ओर. जैसा टेलीफोन मे होता है.
३. पूर्ण डुप्लेक्स चेनल (Full Duplex Channel)-
——————————->
A <—————————-B
——————————->
B —————————->A
इस  चेनल मे डाटा का प्रवाह दोनों दिशाओं मे एक साथ होता है. एक ही समय मे डेटा A से B की ओर  या  B से  A की ओर भेजा जाता हैं. जैसा के कंप्यूटर इन्टरनेट सेवा मे होता है.


कंप्यूटर नेटवर्क के प्रकार
कंप्यूटर नेटवर्क आपस मे जुड़े कंप्यूटरों का समूह है जो एक दूसरे से संचार स्थापित करने तथा सूचनाओ, संसाधनों को साझा इस्तेमाल करने मे सक्षम होते है.
नेटवर्क के निम्नलिखित प्रकार होते है-
लोकल एरिया नेटवर्क- LAN- (LOCAL AREA NETWORK)- यह एक कंप्यूटर नेटवर्क है जिसके अंदर भौगोलिक परिधि सिमित होता है जैसे – घर, ऑफिस, भवनों का छोटा समूह आदि का कंप्यूटर नेटवर्क. वर्तमान लेन इथेर्नेट तकनीक पर आधारित होता है. इस नेटवर्क का आकार छोटा परन्तु डाटा संचारण की तीव्र गति होती है.
वाईड एरिया नेटवर्क – WAN- (WIDE AREA NETWORK)- इस नेटवर्क मे कंप्यूटर आपस मे लीज्ड लाइन या स्विच सर्किट के दुवारा जुड़े रहते हैं. इस नेटवर्क की भौगोलिक परिधि बड़ी होती है जैसे पूरा शहर, देश या महादेश मे फैला नेटवर्क का जाल. इन्टरनेट इसका एक अच्छा उदाहरण हैं. बैंको का ATM सुविधा वाईड एरिया नेटवर्क का उदाहरण हैं.
मेट्रोपॉलिटन एरिया नेटवर्क- MAN- (METROPOLITAN AREA NETWORK)- इसके अंतर्गत दो या दो से अधिक लोकल एरिया नेटवर्क एक साथ जुड़े होते हैं. यह एक शहर के सीमाओ के भीतर का स्थित कंप्यूटर नेटवर्क होता हैं. राउटर, स्विच और हब्स मिलकर एक मेट्रोपोलिटन एरिया नेटवर्क का निर्माण करता हैं.  

सिंगल यूजर और मल्टीयूजर

जैसा की नाम से ही स्पष्ट है सिंगल यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम में कम्प्यूटर पर एक समय में एक आदमी काम सकता है । सिंगल यूजर  ऑपरेटिंग सिस्टम मुख्यतः पर्सनल कम्प्यूटरों में प्रयोग किए जाते हैं, जिनका घरों व छोटे कार्यालयों में उपयोग होता है । डॉस, विंडोज इसी के उदाहरण है । मल्टीयूजर प्रकार के सिस्टमों में एक समय में बहुत सारे व्यक्ति काम कर सकते हैं और एक ही समय पर अलग-अलग विभिन्न कामों को किया जा सकता है । जाहिर है, इससे कम्प्यूटर के विभिन्न संसाधनों का एक साथ प्रयोग किया जा सकता है । यूनिक्स इसी प्रकार का ऑपरेटिंग सिस्टम है ।

कम्प्यूटर वायरस

VIRUS – Vital Information Resources Under Seized
यह नाम सयोग वश बीमारी वाले वायरस से मिलता है मगर ये उनसे पूर्णतः अलग होते है.वायरस प्रोग्रामों का प्रमुख उददेश्य केवल कम्प्यूटर मेमोरी में एकत्रित आंकड़ों व संपर्क में आने वाले सभी प्रोग्रामों को अपने संक्रमण से प्रभावित करना है ।वास्तव में कम्प्यूटर वायरस कुछ निर्देशों का एक कम्प्यूटर प्रोग्राम मात्र होता है जो अत्यन्त सूक्षम किन्तु शक्तिशाली होता है । यह कम्प्यूटर को अपने तरीके से निर्देशित कर सकता है । ये वायरस प्रोग्राम किसी भी सामान्य कम्प्यूटर प्रोग्राम के साथ जुड़ जाते हैं और उनके माध्यम से कम्प्यूटरों में प्रवेश पाकर अपने उददेश्य अर्थात डाटा और प्रोग्राम को नष्ट करने के उददेश्य को पूरा करते हैं । अपने संक्रमणकारी प्रभाव से ये सम्पर्क में आने वाले सभी प्रोग्रामों को प्रभावित कर नष्ट अथवा क्षत-विक्षत कर देते हैं । वायरस से प्रभावित कोई भी कम्प्यूटर प्रोग्राम अपनी सामान्य कार्य शैली में अनजानी तथा अनचाही रूकावटें, गलतियां तथा कई अन्य समस्याएं पैदा कर देता है ।प्रत्येक वायरस प्रोग्राम कुछ कम्प्यूटर निर्देशों का एक समूह होता है जिसमें उसके अस्तित्व को बनाएं रखने का तरीका, संक्रमण फैलाने का तरीका तथा हानि का प्रकार निर्दिष्ट होता है । सभी कम्प्यूटर वायरस प्रोग्राम मुख्यतः असेम्बली भाषा या किसी उच्च स्तरीय भाषा जैसे “पास्कल” या “सी” में लिखे होते हैं ।
वायरस के प्रकार 
1. बूट सेक्टर वायरस
2. फाइल वायरस
3. अन्य वायरस
वायरस का उपचार : टीके 
जिस प्रकार वायरस सूक्षम प्रोग्राम कोड से अनेक हानिकारक प्रभाव छोड़ता है ठीक उसी तरह ऐसे कई प्रोग्राम बनाये गये हैं जो इन वायरसों को नेस्तानाबूद कर देते हैं, इन्हें ही वायरस के टीके कहा जाता है । यह टीके विभिन्नन वायरसों के चरित्र और प्रभाव पर संपूर्ण अध्ययन करके बनाये गये हैं और काफी प्रभावी सिद्ध हुयें है ।


आपरेटिंग सिस्टम की विशेषताए

1)मेमोरी प्रबंधन 
प्रोग्राम एवं आकडो को क्रियान्वित करने से पहले मेमोरी मे डालना पडता है अधिकतर आपरेटिंग सिस्टम एक समय मे एक से अधिक प्रोग्राम को मेमोरी मे रहने की सुविधा प्रदान करता है आपरेटिंग सिस्टम यह निश्चित करता है कि प्रयोग हो रही मेमोरी अधिलेखित न हो प्रोग्राम स्माप्त होने पर प्रयोग होने वाली मेमोरी मुक्त हो जाती है ।
2) मल्टी प्रोग्रामिंग
एक ही समय पर दो से अधिक प्रक्रियाओ का एक दूसरे पर प्रचालन होना मल्टी प्रोग्रामिंग कहलाता है । विशेष तकनिक के आधार पर सी.पी.यू. के द्वारा निर्णय लिया जाता है कि इन प्रोग्राम मे से किस प्रोग्राम को चलाना हैएक ही समय मे सी.पी. यू. किसी प्रोग्राम को चलाता है
3) मल्टी प्रोसेसिंग 
एक समय मे एक से अधिक कार्य के क्रियान्वयन के लिए सिस्टम पर एक से अधिक सी.पी.यू रहते है । इस तकनीक को मल्टी प्रोसेसिंग कहते है । एक से अधिक प्रोसेसर उपल्ब्ध होने के कारण इनपुट आउटपुट एवं प्रोसेसींगतीनो कार्यो के मध्य समन्वय रहता है ।
4) मल्टी टास्किंग 
मेमोरी मे रखे एक से अधिक प्रक्रियाओ मे परस्पर नियंत्रण मल्टी टास्किंग कहलाता है किसी प्रोग्राम से नियत्रण हटाने से पहले उसकी पूर्व दशा सुरक्षित कर ली जाती है जब नियंत्रण इस प्रोग्राम पर आता है प्रोग्राम अपनी पूर्व अवस्था मे रहता है । मल्टी टास्किंग मे यूजर को ऐसा प्रतित होता है कि सभी कार्य एक साथ चल रहे है।
5) मल्टी थ्रेडिंग 
यह मल्टी टास्किंग का विस्तारित रूप है एक प्रोग्राम एक से अधिक थ्रेड एक ही समय मे चलाता है । उदाहरण के लिए एक स्प्रेडशिट लम्बी गरणा उस समय कर लेता है जिस समय यूजर आंकडे डालता है
6)रियल टाइम 
रियल टाइम आपरेटिंग सिस्टम की प्रक्रिया बहुत ही तीव्र गति से होती है रियल टाइम आपरेटिंग सिस्टम का उपयोग तब किया जाता है जब कम्पयुटर के द्वारा किसी कारेय विशेष का नियंत्रण किया जा रहा होता है । इस प्रकार के प्रयोग का परिणाम तुरंत प्राप्त होता है । और इस परिणाम को अपनी गरणा मे तुरंत प्रयोग मे लाया जाता है । आवशअयकता पडने पर नियंत्रित्र की जाने वाली प्रक्रिया को बदला जा सकता है । इस तकनीक के द्वारा कम्पयुटर का कार्य लगातार आंकडे ग्रहण करना उनकी गरणा करना मेमोरी मे उन्हे व्यवस्थित करना तथा गरणा के परिणाम के आधार पर निर्देश देना है


कम्प्यूटर नेटवर्क

आज के युग मे उपयोगकर्ता को इलेक्ट्रानिक संचार की आवश्यकता है लोगो के परस्पर सूचना के संचार के संचार के लिए तकनीक की आवश्यकता है । एक अच्छी सूचना संचार पद्धति प्रत्येक संस्थानो के लिए आवश्यक है संस्थाए सूचना की प्रक्रिया के लिए परस्पर जुडे हुए कम्प्यूटर पर निर्भर रहती है इलेकट्रानिकी की सहायता एक से स्थान से दूसरे स्थान पर सूचना प्रेषित करने की क्रिया को दूरसंचार कहते है । एक या एक से अधिक कम्प्यूटर और विविध प्रकार के टर्मिनलो के बीच आंकडो को भेजना या प्राप्त करना डाटा संचार कहलाता है ।
नेटवर्क की रूप रेखा
सामान्यतया संचार नेटवर्क मे किसी चैनल के माध्यम से प्रेषक अपना संदेश प्राप्तकर्ता को भेजता है। किसी भी नेटवर्क के पाँच मूल अंग है ।
1) टर्मिनल 
टर्मिनल मुख्य रूप से वीडियो टर्मिनल एवं वर्कस्टेशनो का समावेश होता है । इन पुट एवं आउट पुट उपकरण नेटवर्क मे डेटा भेजने एवं प्राप्त करने का कार्य करते है उदाहरणःमाइक्रोकम्प्यूटर ,टेलीफोन फेक्स मशीन आदि
2) दूरसंचार प्रोसेसर 
दूरसंचार प्रोसेसर वे टर्मिनल और कम्प्यूटर के बीच रहते है । ये डाटा भेजने एवं प्राप्त करने के सहायता करते है । मोडेम मल्टीप्लेक्सर ,फ्रन्ट एण्ड प्रोसेसर जैसे उपकरण नेटवर्क मे होने वाली विविध क्रियाओ और नियंत्रणो मे सहायता करता है।
3)दूरसंचार चैनल एवं माध्यम 
वे माध्यम जिनके उपर डाटा प्रेषित एवं प्राप्त किया जाता है उसे दूरसंचार चैनल कहते है । दूरसंचार नेटवर्क के विभिन्न अंगो को जोडने के लिए माध्यम का उपयोग करते है ।
4)कम्प्यूटर 
नेटवर्क सभी प्रकार के कम्प्यूटर को आपस मे जोडता है । जिससे वे उसकी सूचना पर प्रक्रिया कर सके ।
5)दूरसंचार साफ्टवेयर 
दूरसंचार साफ्टवेयर एक प्रोग्राम है जोकि होस्ट कम्प्यूटर पद्धति पर आधारित है । यह कम्प्यूटर पद्धति दूरसंचार विधियो को नियंत्रित करता है और नेटवर्क की क्रियाऔ को व्यवस्थित करता है

इन्टरनेट में प्रयुक्त एड्रेस के मूलभूत हिस्से को डोमेन कहा जाता हैं. इन्टरनेट से जुड़े प्रत्येक कंप्यूटर का एक डोमेन नेम होता हैं जिसे डोमेन नेम सिस्टम (DNS) कहा जाता हैं. डोमेन नेम को मुख्यतः ३ भागों में बाँटा गया हैं
  • जेनेरिक डोमेन
  • कन्ट्री डोमेन
  • इनवर्स डोमेन
उदाहरण के लिए http://www.google.com  इसमें डब्लू डब्लू  डब्लू यह बतलाता हैं की यह एक इन्टरनेट पेज हैं जिसका नाम google हैं और इसका डोमेन .com हैं.

American Standard Code For Information Interchange
आज हम कंप्यूटर पर आसनी जो कुछ भी लिखते हैं वो आस्की में ही लिखा होता है. प्रत्येक कंप्यूटर प्रयोगकर्ता अंकों, अक्षरों तथा संकेतों के लिए बाइनरी सिस्टम पर आधारित कोड का निर्माण करके कंप्यूटर को परिचालित कर सकता है! लेकिन उसके कोड केवल उसी के द्वारा प्रोग्रामों और आदेशों के लिए लागू होंगे! इससे कंप्यूटर के प्रयोगकर्ता परस्पर सूचनाओं का आदान प्रदान तब तक नहीं कर सकते जब तक कि वे एक -दूसरे द्वारा इस्तेमाल किये हुए कोड संकेतों से परिचित न हों! सूचनाओं के आदान प्रदान की सुविधा के लिए अमेरिका मे एक मानक कोड तैयार किया गया है जिसे अब पूर विश्व मे मान्यता प्राप्त है! इसे आस्की (ASCII) के नाम से जाना जाता है! इसमे प्रत्येक अंक, अक्षरों वा संकेत को 8 बीटो से दर्शाया गया है! इन 8स्थानों पर केवल 0 और 1 की संख्या ही लिखी गयी है!


सॉफ्टवेयर दो प्रकार के होते हैं ।
1)सिस्टम सॉफ्टवेयर
“सिस्टम सॉफ्टवेयर” यह एक ऐसा प्रोग्राम होता है , जिनका काम सिस्टम अर्थात कम्प्यूटर को चलाना तथा उसे काम करने लायक बनाए रखना है । सिस्टम सॉफ्टवेयर ही हार्डवेयर में जान डालता है । ऑपरेटिंग सिस्टम, कम्पाइलर आदि सिस्टम सॉफ्यवेयर के मुख्य भाग हैं ।

2)एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर
‘एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर’ ऐसे प्रोग्रामों को कहा जाता है, जो हमारे कंप्यूटर पर आधारित मुख्य  कामों को करने के लिए लिखे जाते हैं । आवश्यकतानुसार भिन्न-भिन्न उपयोगों के लिए भिन्न-भिन्न सॉफ्टवेयर होते हैं । वेतन की गणना, लेन-देन का हिसाब, वस्तुओं का स्टाक रखना, बिक्री का हिसाब लगाना आदि कामों के लिए लिखे गए प्रोग्राम ही एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर कहे जाते  हैं ।